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वन पर्व
अध्याय ४
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो दिवाकरः प्रीतो दर्शय़ामास पाण्डवम् |  १   क
दीप्यमानः स्ववपुषा ज्वलन्निव हुताशनः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति