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वन पर्व
अध्याय ४
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वैशम्पाय़न उवाच
यत्तेऽभिलषितं राजन्सर्वमेतदवाप्स्यसि |  २   क
अहमन्नं प्रदास्यामि सप्त पञ्च च ते समाः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति