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विराट पर्व
अध्याय ४
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धौम्य उवाच
नैषां दारेषु कुर्वीत मैत्रीं प्राज्ञः कथञ्चन |  १४   क
अन्तःपुरचरा ये च द्वेष्टि यानहिताश्च ये ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति