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वन पर्व
अध्याय ८२
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पुलस्त्य उवाच
ततो गच्छेत राजेन्द्र भर्तृस्थानमनुत्तमम् |  ६८   क
कोटितीर्थे नरः स्नात्वा अर्चय़ित्वा गुहं नृप |  ६८   ख
गोसहस्रफलं विन्देत्तेजस्वी च भवेन्नरः ||  ६८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति