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विराट पर्व
अध्याय ४४
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कृप उवाच
देशकालेन संय़ुक्तं युद्धं विजय़दं भवेत् |  ३   क
हीनकालं तदेवेह फलवन्न भवत्युत |  ३   ख
देशे काले च विक्रान्तं कल्याणाय़ विधीय़ते ||  ३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति