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विराट पर्व
अध्याय ४
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वैशम्पाय़न उवाच
अग्निं प्रदक्षिणं कृत्वा व्राह्मणांश्च तपोधनान् |  ४९   क
याज्ञसेनीं पुरस्कृत्य षडेवाथ प्रवव्रजुः ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति