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विराट पर्व
अध्याय ४
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युधिष्ठिर उवाच
सर्वैरपि च वक्तव्यं न प्रज्ञाय़न्त पाण्डवाः |  ५   क
गता ह्यस्मानपाकीर्य सर्वे द्वैतवनादिति ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति