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वन पर्व
अध्याय ७३
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केशिन्यु उवाच
भूय़ एव सुगन्धीनि हृषितानि भवन्ति च |  १७   क
एतान्यद्भुतकल्पानि दृष्ट्वाहं द्रुतमागता ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति