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भीष्म पर्व
अध्याय ४
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धृतराष्ट्र उवाच
यथा भवान्वेद तथास्मि वेत्ता; भावाभावौ विदितौ मे यथावत् |  ११   क
स्वार्थे हि संमुह्यति तात लोको; मां चापि लोकात्मकमेव विद्धि ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति