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भीष्म पर्व
अध्याय ४
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व्यास उवाच
गम्भीरघोषाश्च महास्वनाश्च; शङ्खा मृदङ्गाश्च नदन्ति यत्र |  १७   क
विशुद्धरश्मिस्तपनः शशी च; जय़स्यैतद्भाविनो रूपमाहुः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति