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भीष्म पर्व
अध्याय ४
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व्यास उवाच
हृष्टा वाचस्तथा सत्त्वं योधानां यत्र भारत |  २१   क
न म्लाय़न्ते स्रजश्चैव ते तरन्ति रणे रिपून् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति