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वन पर्व
अध्याय १६१
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वैशम्पाय़न उवाच
मय़ूरहंसस्वननादितानि; पुष्पोपकीर्णानि महाचलस्य |  ४   क
शृङ्गाणि सानूनि च पश्यमाना; गिरेः परं हर्षमवाप्य तस्थुः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति