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द्रोण पर्व
अध्याय ९७
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सञ्जय़ उवाच
अत्र कार्यं समाधत्स्व प्राप्तकालमरिन्दम |  ५२   क
स्थाने वा गमने वापि दूरं यातश्च सात्यकिः ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति