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भीष्म पर्व
अध्याय ४
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वैशम्पाय़न उवाच
धर्म्यं देशय़ पन्थानं समर्थो ह्यसि वारणे |  ४   क
क्षुद्रं ज्ञातिवधं प्राहुर्मा कुरुष्व ममाप्रिय़म् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति