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द्रोण पर्व
अध्याय ४
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सञ्जय़ उवाच
सोऽभिवीक्ष्य नरौघाणां स्थानमप्रतिमं महत् |  १४   क
व्यूढप्रहरणोरस्कं सैन्यं तत्समवृंहय़त् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति