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द्रोण पर्व
अध्याय ४
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सञ्जय़ उवाच
पर्जन्य इव भूतानां प्रतिष्ठा सुहृदां भव |  ३   क
वान्धवास्त्वानुजीवन्तु सहस्राक्षमिवामराः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति