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द्रोण पर्व
अध्याय ४
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सञ्जय़ उवाच
गिरिव्रजगताश्चापि नग्नजित्प्रमुखा नृपाः |  ५   क
अम्वष्ठाश्च विदेहाश्च गान्धाराश्च जितास्त्वय़ा ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति