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कर्ण पर्व
अध्याय ४
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सञ्जय़ उवाच
कैतव्यानामधिपः शूरमानी; रणे रणे शत्रुहा राजपुत्रः |  १०२   क
पत्री हय़ी नागरथप्रय़ाय़ी; व्यवस्थितो योद्धुकामस्त्वदर्थे ||  १०२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति