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कर्ण पर्व
अध्याय ४
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वैशम्पाय़न उवाच
एवं व्रुवन्नेव तदा धृतराष्ट्रोऽम्विकासुतः |  १०७   क
हतप्रवीरं विध्वस्तं किञ्चिच्छेषं स्वकं वलम् |  १०७   ख
श्रुत्वा व्यामोहमगमच्छोकव्याकुलितेन्द्रिय़ः ||  १०७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति