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कर्ण पर्व
अध्याय ४
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वैशम्पाय़न उवाच
मुह्यमानोऽव्रवीच्चापि मुहूर्तं तिष्ठ सञ्जय़ |  १०८   क
व्याकुलं मे मनस्तात श्रुत्वा सुमहदप्रिय़म् |  १०८   ख
नष्टचित्तस्ततः सोऽथ वभूव जगतीपतिः ||  १०८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति