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कर्ण पर्व
अध्याय ४
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वैशम्पाय़न उवाच
दुष्प्रणीतेन मे तात मनसाभिप्लुतात्मनः |  २   क
हतं वैकर्तनं श्रुत्वा शोको मर्माणि कृन्तति ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति