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कर्ण पर्व
अध्याय ४
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सञ्जय़ उवाच
यस्य राजन्गजानीकं वहुसाहस्रमद्भुतम् |  २०   क
सुदक्षिणः स सङ्ग्रामे निहतः सव्यसाचिना ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति