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उद्योग पर्व
अध्याय १४५
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वैशम्पाय़न उवाच
सन्ध्यामुपास्य ध्याय़न्तस्तमेव गतमानसाः |  ४   क
आनाय़्य कृष्णं दाशार्हं पुनर्मन्त्रममन्त्रय़न् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति