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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
ततो गच्छेत धर्मज्ञ तीर्थं संनिहितीमपि |  १६६   क
यत्र व्रह्मादय़ो देवा ऋषय़श्च तपोधनाः |  १६६   ख
मासि मासि समाय़ान्ति पुण्येन महतान्विताः ||  १६६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति