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कर्ण पर्व
अध्याय ४
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सञ्जय़ उवाच
तथैव रथिनां श्रेष्ठः क्षेमधूर्तिर्विशां पते |  ४२   क
निहतो गदय़ा राजन्भीमसेनेन संय़ुगे ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति