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कर्ण पर्व
अध्याय ४
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सञ्जय़ उवाच
तथार्जुनेन निहतो द्वैरथे युद्धदुर्मदः |  ५४   क
सामात्यवान्धवो राजन्कर्णः प्रहरतां वरः ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति