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कर्ण पर्व
अध्याय ४
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सञ्जय़ उवाच
जय़ाशा धार्तराष्ट्राणां वैरस्य च मुखं यतः |  ५५   क
तीर्णं तत्पाण्डवै राजन्यत्पुरा नाववुध्यसे ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति