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कर्ण पर्व
अध्याय ४
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सञ्जय़ उवाच
स एष कदनं कृत्वा महद्रणविशारदः |  ६३   क
परिवार्य महामात्रैः षड्भिः परमकै रथैः |  ६३   ख
अशक्नुवद्भिर्वीभत्सुमभिमन्युर्निपातितः ||  ६३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति