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कर्ण पर्व
अध्याय ४
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सञ्जय़ उवाच
महारथः कृतिमान्क्षिप्रहस्तो; दृढाय़ुधो दृढमुष्टिर्दृढेषुः |  ९१   क
स वीर्यवान्द्रोणपुत्रस्तरस्वी; व्यवस्थितो योद्धुकामस्त्वदर्थे ||  ९१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति