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कर्ण पर्व
अध्याय ४
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सञ्जय़ उवाच
शारद्वतो गौतमश्चापि राज; न्महावलो वहुचित्रास्त्रय़ोधी |  ९३   क
धनुश्चित्रं सुमहद्भारसाहं; व्यवस्थितो योत्स्यमानः प्रगृह्य ||  ९३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति