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शल्य पर्व
अध्याय ४
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सञ्जय़ उवाच
एवमुक्तस्ततो राजा गौतमेन यशस्विना |  १   क
निःश्वस्य दीर्घमुष्णं च तूष्णीमासीद्विशां पते ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति