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शल्य पर्व
अध्याय ४
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सञ्जय़ उवाच
दुःशासनेन यत्कृष्णा एकवस्त्रा रजस्वला |  १६   क
परिक्लिष्टा सभामध्ये सर्वलोकस्य पश्यतः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति