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शल्य पर्व
अध्याय ४
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सञ्जय़ उवाच
तथा विवसनां दीनां स्मरन्त्यद्यापि पाण्डवाः |  १७   क
न निवारय़ितुं शक्याः सङ्ग्रामात्ते परन्तपाः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति