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शल्य पर्व
अध्याय ४
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सञ्जय़ उवाच
यदा च द्रौपदी कृष्णा मद्विनाशाय़ दुःखिता |  १८   क
उग्रं तेपे तपः कृष्णा भर्तॄणामर्थसिद्धय़े |  १८   ख
स्थण्डिले नित्यदा शेते यावद्वैरस्य यातना ||  १८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति