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शल्य पर्व
अध्याय ४
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सञ्जय़ उवाच
ततो मुहूर्तं स ध्यात्वा धार्तराष्ट्रो महामनाः |  २   क
कृपं शारद्वतं वाक्यमित्युवाच परन्तपः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति