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शल्य पर्व
अध्याय ४
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सञ्जय़ उवाच
इति सर्वं समुन्नद्धं न निर्वाति कथञ्चन |  २०   क
अभिमन्योर्विनाशेन स सन्धेय़ः कथं मय़ा ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति