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शल्य पर्व
अध्याय ४
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सञ्जय़ उवाच
कथं च नाम भुक्त्वेमां पृथिवीं सागराम्वराम् |  २१   क
पाण्डवानां प्रसादेन भुञ्जीय़ां राज्यमल्पकम् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति