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कर्ण पर्व
अध्याय २८
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सञ्जय़ उवाच
प्रपेततुः स्पर्धय़ाथ ततस्तौ हंसवाय़सौ |  ३२   क
एकपाती च चक्राङ्गः काकः पातशतेन च ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति