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शान्ति पर्व
अध्याय २३१
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शुक उवाच
प्रजावाञ्श्रोत्रिय़ो यज्वा वृद्धः प्रज्ञोऽनसूय़कः |  २   क
अनागतमनैतिह्यं कथं व्रह्माधिगच्छति ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति