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शल्य पर्व
अध्याय ४
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सञ्जय़ उवाच
पितामहेन वृद्धेन तथाचार्येण धीमता |  ३८   क
जय़द्रथेन कर्णेन तथा दुःशासनेन च ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति