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शल्य पर्व
अध्याय ४
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सञ्जय़ उवाच
तैस्त्वय़ं रचितः पन्था दुर्गमो हि पुनर्भवेत् |  ४१   क
सम्पतद्भिर्महावेगैरितो याद्भिश्च सद्गतिम् ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति