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भीष्म पर्व
अध्याय ३३
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अर्जुन उवाच
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्म; न्गरीय़से व्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे |  ३७   क
अनन्त देवेश जगन्निवास; त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति