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शल्य पर्व
अध्याय ४
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सञ्जय़ उवाच
एवं दुर्योधनेनोक्तं सर्वे सम्पूज्य तद्वचः |  ४६   क
साधु साध्विति राजानं क्षत्रिय़ाः सम्वभाषिरे ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति