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शल्य पर्व
अध्याय ४
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सञ्जय़ उवाच
ततो वाहान्समाश्वास्य सर्वे युद्धाभिनन्दिनः |  ४८   क
ऊने द्विय़ोजने गत्वा प्रत्यतिष्ठन्त कौरवाः ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति