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अनुशासन पर्व
अध्याय २७
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सिद्ध उवाच
ऋषिष्टुतां विष्णुपदीं पुराणीं; सुपुण्यतोय़ां मनसापि लोके |  ९२   क
सर्वात्मना जाह्नवीं ये प्रपन्ना; स्ते व्रह्मणः सदनं सम्प्रय़ाताः ||  ९२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति