आश्रमवासिक पर्व  अध्याय ४०

वैशम्पाय़न उवाच

धृतराष्ट्रस्तु धर्मात्मा पाण्डवैः सहितस्तदा |  २   क
शुचिरेकमनाः सार्धमृषिभिस्तैरुपाविशत् ||  २   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति