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शान्ति पर्व
अध्याय १८३
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भृगुरु उवाच
इह खल्वमुष्मिंश्च लोके सर्वारम्भप्रवृत्तय़ः सुखार्था अभिधीय़न्ते |  ९   क
सुखप्रय़ोजना भरद्वाज उवाच ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति