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वन पर्व
अध्याय ५३
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नल उवाच
वर्ण्यमानेषु च मय़ा भवत्सु रुचिरानना |  १८   क
मामेव गतसङ्कल्पा वृणीते सुरसत्तमाः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति