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शल्य पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
तादृशानां सहस्राणि प्रय़ुतान्यर्वुदानि च |  ११०   क
अभिषिक्तं महात्मानं परिवार्योपतस्थिरे ||  ११०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति