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वन पर्व
अध्याय ४०
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वैशम्पाय़न उवाच
स दृष्ट्वा वाणवर्षं तन्मोघीभूतं धनञ्जय़ः |  २८   क
परमं विस्मय़ं चक्रे साधु साध्विति चाव्रवीत् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति